कैदियों के मानवाधिकार की प्राचीनतम् से वर्तमान व्यवस्था पर विश्लेष्णात्मक अध्ययन

 

प्रदीप शर्मा1, डाॅ. सी.एल. पटेल2

1सहायक प्राध्यापक (विधि), पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (..)

2संकाध्यक्ष, विधि अध्ययन शाला, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (..)

 

प्रस्तावना

पीड़ित जनता ने शक्तिशाली और साधन संपन्न लोगों, मुखियाओं सरदारों तथा राजाओं द्वारा दुर्बल वर्गो पर किए जा रहे अत्याचारों को चुपचाप स्वीकार नहीं कर लिया। इतिहास साक्षी है कि जैसे-जैसे उत्पीड़न बढ़ा वैसे-वैसे पीड़ित वर्गो ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष तेज कर दिया। यद्यपि इतिहास में सैंकड़ों ऐसी घटनाएं है पर मैं यहाँ केवल दो घटनाओं को जिक्र करना चाहूंगा:-

 

1. घटना हम दो शताब्दी ईसा पूर्व के इटली राज्य से लेते है और दूसरी बींसवी शताब्दी के भारत वर्ष से। इन दोनों घटनाओं के बीच के दो हजार वर्ष के समय में पीड़ित जनता ने अपने अधिकारों के लिए कितने संघर्ष किए होंगे। इन समयों में कितने युद्ध और विद्रोह हुए होंगे। इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। इटली के ऐतिहासिक जनविद्रोह से शक्तिशाली संभ्रान्त वर्गो द्वारा निर्बल वर्गो के घुटने आर्थिक, सामाजिक एवं शारीरिक शोषण करना आम बात हो गया है। इसी तरह युद्धों के दौरान पकड़े गये व्यक्तियों के खरीदने बेचने के लिए ऐतिहासिक शोध बताते है कि मंडीया स्थापित है। इससे भी अधिक पीड़ादायक उदाहरण भारत की धरती पर मिला जहाँ बींसवी शताब्दी में सभ्य अंग्रेज साम्राज्य ने 1919 में भारत की सीमाओं में रोलेट एक्ट के नाम एक अन्धा कानून लागू किया। जिसमें अंग्रेज पुलिस बिना कारण बताए भारतीयों को जेल में ठूंस देती थी। ऐसे संघर्षो ने ही सन् 1215 . में मेग्नाकार्टा के रूप में इस अधिकारों की स्वीकृति का कारण बना। मेग्नाकार्टा की स्वीकृति के बाद मानवाधिकार के संबंध में एक के बाद एक घोषणाएँ होती रही। आज के युग तक आते-आते इन अधिकारों को संविधान ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यताएँ प्राप्त हुई। सं.रा. संघ की घोषणा के पहले इन अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय संधियों और घोषणा पत्र में भी मान्यता दी जाने लगी। फ्रांस की क्रांति के पहले इंग्लैण्ड में बिल आॅफ राइट्स (1689) के द्वारा भी कानून की दृष्टि में एवं समानता तथा प्रजातांत्रिक मूल्यों की घोषणा आदि सम्मिलित किए गए। 26 जून 1945 को हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्वीकृति की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके पश्चात निरंतर आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में होने वाला विनाश को ध्यान में रखकर नये-नये अधिकारों के संबंध में घोषणाएँ लगभग 50 वर्ष के अंतराल में की गई एवं इसके पालन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर गुहार लगाई गई।1

 

कैदी एवं मानवाधिकार

मानवाधिकार क्या है ? स्वार्थ में आवेश में या प्रतिशोध में कि जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के, या एक समूह किसी दूसरे समूह के मूलभूत अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप करता है तो उसी का नाम अन्याय है, अपराध है एवं जिन अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप होता है वे मूलभूत अधिकार होते है। इन मूलभूत अधिकारों से तात्पर्य मानव के लिए मानव को, मानव होने के लिए आवश्यक अधिकारों से है। सरल अर्थो में मानव गरिमा को बनाए रखने के लिए जिन अधिकारों की आवश्यकता होती है उन्हें हम मानव अधिकार कह सकते है। हर मनुष्य के कुछ न्यूनतम अधिकार है या होने चाहिए यह मानवाधिकारवादी धारण है। मानवाधिकार के समकालीन विचार विमर्श में किसी भी सामाजिक या राजनैतिक पहचान से परिभाषित होने से पहले हर मनुष्य ’’व्यक्ति’’ है, और इस व्यक्तित्व की असहमति या अभिव्यक्तित के अंधाधुन्ध दमन का अधिकार किसी भी पहचान के राजनैतिक या सामाजिक सत्ता तंत्र को नहीं होना चाहिए। सत्ता तंत्र चाहे समता मूलक हो या विषमता मूलक, लोकतंत्र हो या राजतंत्र, राजनैतिक असहमति और सांस्कृतिक विशिष्टता के दमन का अधिकार किसी को नहीं हो सकता। मानवाधिकार संबंधी विमर्श का मूल स्त्रोत ’’व्यक्तितत्व की स्वीकृति’’, प्रतिष्ठा हमारी सामाजिक संरचना में है। मूलतः पश्चिम से आयतीत मानवाधिकार शब्द की मूल संकल्पना कुछ ऐसी ही है, जिसमें मानवाधिकार की धारणा को आवश्यक रूप से उपर्युक्त पर आधारित माना है। मानवाधिकार शब्द की संकल्पना उतनी ही पुरानी है जितनी कि प्राकृतक विधि पर आधारित प्राचीन विधि का सिद्धांत।

 

मैक्फारलेने डंबंितसंदम ने मानवाधिकारों को परिभाषित करते हुए उसके पांच प्रमुख बिन्दु बताएँ:-

1.         मानवाधिकार सार्वभौमिक है, क्योंकि ये सभी व्यक्तियों, सभी समयों तथा सभी स्थितियों में प्राप्त होते है।

2.         इन अधिकारों की उत्पत्ति मानव के स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में जन्म लेने से हुई है। इसीलिए वे व्यक्ति को जीने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।

3.         मानवाधिकारों का राज्य द्वारा अतिक्रमण किया जाना ही इसी उत्पत्ति का कारण है।

4.         मानवाधिकार को व्यवहारिक तभी माना जा सकता है जब वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम इतना अवसर एवं सुविधायें प्रदान करे जिनसे वह अपना जीवनयापन कर सकें।

5.         मानवाधिकार से तात्पर्य ऐसे विकारों से है जिसका वास्तविक रूप से क्रियान्वयन किया जा सकें।

 

दूसरे महायुद्ध के बाद स्वाधीन हुए लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों ने अपने-अपने संविधानों में मानवाधिकारों से संबंधित उन समस्त प्रावधानों को मान्यता दी जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने चार्टर ने स्वीकार किया था जिन पर विश्व भर के जनप्रतिनिधि ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगायी थी। यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो मात्र इतना कि विभिन्न देशों ने अपने विशेष सांस्कृतिक सामाजिक स्वरूप के अनुसार इसमें कुछ संसोधन और परिवर्तन कर लिया। उदाहरण के लिए भारत के संविधान को ले जो अतीत का उत्तराधिकारी होता है और भविष्य का वसीयतकर्ता’’ भारतीय संविधान पर उतना ही लागू होता है जितना अन्य पर। क्योंकि भारतीय संविधान ने केवल मूल अधिकार की व्यवस्था की अपितु उसके परिवर्तन का भी उपाय किया। अर्थात केवल मानव अधिकार के सिद्धांत को स्वीकार किया अपितु उसके उल्लंघन की स्थिति में उपचार की भी व्यवस्था कर दी। इस तरह भारतीय संविधान एक प्रगतिशील दस्तावेज होते हुए उन समस्त मूल्यों को सुरक्षित करता है जो मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में शामिल थे। परन्तु कुछ अधिकार ऐसे थे जो यद्यपि संविधान में शामिल नहीं किए गए लेकिन सामान्य विधि में ग्रहित किए गए। जैसे गर्भवती महिलाओं को मृत्युदण्ड दिए जाने संबंधी अधिकार किशोर अपराधियों के साथ व्यवहार किए जाने। साथ ही साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के दस्तावेज एक बंदी व्यक्ति को न्यायिक अधिकारी के समक्ष ’’तत्पर्ता’’ से प्रस्तुत किए जाने का प्रावधान करता है वहीं भारतीय संविधान एक कदम और आगे बढ़कर उसे 24 घंटे की आदेशात्मक अवधि के भीतर प्रस्तुत किए जाने का प्रावधान करती है। जहाँ नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा एक अभियुक्त की अपने वकील के साथ ’’संपर्क करने’’ के अधिकार को मान्यता देता है वहीं भारतीय संविधान इस अधिकार और विस्तृत आयाम देता है और अभियुक्त को अपने वकील से ’’मंत्रणा करने’’ का अधिकार प्रदान करता है। दूसरे ओर भारतीय संविधान में कतिपय अधिकारों का उल्लेख होना भी विचारणीय है।2

 

मानवाधिकार के प्रवर्तन, संवर्धन और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार आयोगो की स्थापना, आयोगो को सौंपी गयी जिम्मेदारी निश्चित ही एक महत्वपूर्ण कड़ी है। क्योंकि ये आयोग एक न्यायालय की भांति निर्णय नहीं करते फिर भी इसकी संस्तुति न्यायालय के निर्णय की तरह प्रवर्तित होती है एवं सामान्यतः इसका आदर होता है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनके कार्यो, संस्तुतियों एवं चेष्टाओं का बड़े पैमाने पर राजनीतिक एवं सामाजिक प्रभाव पड़ता है। मानवाधिकार के संरक्षण के रूप में विश्व स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ को देखा जा सकता है। जो इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु समय-समय पर विभिन्न अंगो की स्थापना कर चार्टर के भावना को लागू करने का प्रयास करता है। आयोगों का वार्षिक प्रतिवेदन मानवाधिकार के संबंध में एक महत्वपूर्ण दस्तावेजन होता है। जिसमें राज्य शासनों से ये अपेक्षा रहती है कि आयोगों की सिफारिशों एवं प्रस्तावित कार्यवाही को अपनायें। क्योंकि आयोग सतत् प्रयासरत है कि सामाजिक बुराईयों की शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही कर पीड़ित को समुचित अनुतोष प्रदान करें। इन आयोगों के ये भी दायित्व रहता है कि समाज के विभिन्न खंडों में मानवाधिकार की साक्षरता का प्रचार-प्रसार करें तथा समाचार पत्रों, बैठकों एवं अन्य उपलब्ध साधनों के माध्यम से मानवाधिकार की सुरक्षा संरक्षण के लिए जानकारी का प्रचार प्रसार करें।3

                                                                                    

कारागार का सुधारात्मक स्वरूप

बंदीगृह राज्य द्वारा स्थापित और संचालित वह स्थान है जहाँ बंदियों को सुधार, उपचार या संरक्षण के प्रयोजन से स्थाई और अस्थाई रूप से रखा जाता है। भारत में बंदीगृहों की व्यवस्था कारागृह अधिनियम (श्रंपस ।बज), 1984 के अनुसार की जाती है। अनेक मानवाधिकार संस्थाओं ने अधिकांश जेलों में भीड़-भाड़, आवास के अभाव, अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा और अपर्याप्त आहार आदि पर चिंता व्यक्त की है। कारागृहों में मुख्यतः चार प्रकार के कैदी वे होते हैं। जिन्हें साधारण कारावास की सजा दी गई हैं। तीसरे प्रकार के कैदी विचाराधीन अभियुक्त होते हैं। चैथे वे होते हैं जिन्हें किसी विशेष अधिनियम, जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, के तहत निरूद्ध किया गया है।

 

डाक्टर डब्ल्यू.सी. रेकलेस नेभारत में कारागार प्रशासन पर एक पुनरीक्षण (त्मअपमू) प्रस्तुत किया तथा भारत को संयुक्त राष्ट्र तकनीकी सहायता क्रम में सुधारों का सुझाव दिया। 1957 में नियुक्त अखिल भारतीय कारागार समिति ने 1960 में एक बन्दीगृह नियमावली नमूना (डवकमस च्तपेवद डंदनंस) तैयार किया जो कि बन्दियों के प्रति व्यवहार के लिए संयुक्त राष्ट्र मानक न्यूनतम नियम (न्दपजमक दंजपवदंे ैजंदकंतक डपदपउनउ त्नसमे वित जीम ज्तमंजउमदज िचतपेवदमते) के अनुकूल था। बन्दियों के वर्गीकरण पर बल दिया गया जिसमें बन्दियों के लिंग, आयु, आपराधिक अभिलेख (त्मबवतके), दण्ड की अवधि, सुरक्षा, प्रशिक्षण व्यवहार तथा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए बन्दियों के वर्गीकरण पर बल दिया गया। संक्षिप्त अवधि के दण्डों की समाप्ति, परिवीक्षा तथा पैरोल (च्ंतवसम) का अधिक उपयोग, किशोर अपराधियों के लिए विशिष्ट कार्यक्रम तथा 16 वर्ष से 21 वर्ष की आयु के बन्दियों के लिए पृथक संस्थाएँ, बन्दीगृह कल्याण अधिकारियों की सहायता से बन्दियों के परिवार तथा अन्य पर्यावरणीय प्रभावों को समझते हुए बन्दियों की वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुसार उनके साथ व्यवहार, बन्दीगृहों से मुक्त किए गए अपराधियों की पश्चात्वर्ती देख रेख तथा पुनर्वास पर भी बल दिया गया।4

 

भारतीय कारागार व्यवस्था में वास्तविक सुधार का प्रारम्भ सन् 1836 से माना जाता है जब एक कारागार जाँच समिति का गठन किया गया जसने कारावासियों से सड़कों के निर्माण-कार्य में मजदूर के रूप में कार्य लिया जाना बन्द किये जाने की अनुशंसा की। तत्पश्चात् सन् 1938 में मेकाले (डंबंनसंल) के सुझाव पर एक कारागार सुधार समिति (श्रंपस त्मवितउे ब्वउउपजजमम) गठित की गई जिसने निम्नलिखित सुझाव दिये-

(1) एक केन्द्रीय बन्दीगृह की स्थापना की जाए जिसमें एक हजार कैदियों को रखने की व्यवस्था हो तथा केवल ऐसे कैदी ही रखे जाएँ जिनकी सजा एक वर्ष से अधिक अवधि की हो।

(2) प्रांतों के विभिन्न कारागारों पर उचित नियन्त्रण रखने हेतु प्रत्येक प्रांत में एक कारागार-निरीक्षक की नियुक्ति की जाए। तदनुसार उत्तर प्रदेश (1844), पंजाब (1952), बंगाल (1954) तथा बम्बई एवं मद्रास (1862) में कारागार निरीक्षक नियुक्त किये गये।

(3) महिला अपराधियों को पृथक रखने की व्यवस्था की जाए।5

 

बींसवी सदी के प्रारम्भिक वर्षो में बाल एवं किशोर अपराधियों की दशा में सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया गया। घोर अपराधियों के सम्पर्क से बचाए रखने के लिए इन्हें बाल-सुधार गृहों तथा बोस्र्टलों में पृथक् रखे जाने की व्यवस्था की गई। इस हेतु सन् 1897 में बोस्र्टल तथा सुधार विद्यालय अधिनियम (ठवतेजंसे ंदक त्मवितउंजवतल ैबीववस ।बजए 1898) पारित किया गया जिसके अन्तर्गत बाल एवं किशोर अपराधियों के लिए अनेक बोस्र्टलों की स्थापना की गई। प्रत्येक कारागार के लिए अधिकतम कैदियों की संख्या निर्धारित की गई। उन दिनों कारागारों के प्रशासक बहुधा अंग्रेज अधिकारी ही हुआ करते थे। बीसवीं शती के प्रारम्भिक दो दशकों में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन ने जोर पकड़ा अतः कारागारों में राजनीतिक कैदियों की भरमार हुई इस हेतु राजनीतिक कैदियों को दो वर्गो में रखा गया। (1) हिंसा बन्दी तथा (2) अहिंसा बन्दी। चूँकि अधिकांश राजनीतिक बन्दी सम्भ्रात भारतीय या मध्यमवर्गीय शिक्षित व्यक्ति होते थे, इसलिए कारागारों में ही उनका संक्षिप्त विचारण किया जाता था। राजनीतिक कैदियों के लिए भोजन, चिकित्सा, मनोरंजन के साधन, सगे सम्बन्धियों से मिलाई आदि समबन्धी विस्तृत कारागार नियम बनाए गये थे। कारागार प्रशासकों का अधिकंाश समय राजनीतिक कैदियों की व्यवस्था तथा देखभाल में व्यतीत होने के कारण इन दो दशकों में सामान्य कैदियों की स्थिति की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका।6

 

निष्कर्ष

कारागृह अधिनियम और कारागृह नियमों द्वारा जिला न्यायाधीशों से अपेक्षा की गई है कि वे अपने जिलों में कारागृह का नियमित निरीक्षण करें और कारागृह प्रशासन की जांँच पर्यवेक्षक की हैसियत से करें। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि लम्बित मामलों के भारी कार्यभार की वजह से जिला न्यायाधीश अपने इन कर्तव्यों का पालन नहीं कर पाते हैं औश्र कारागृह व्यवस्था को विशुद्धतः कारागृह प्राधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया गया है। अतः यह निवेदन है कि उच्च न्यायालय के नियंत्रण के अधीन कारागृह आयोग के रूप में प्रत्येक राज्य में एक सांविधिक निकाय की स्थापना की आवश्यकता है। इसके अध्यक्ष की अर्हता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अर्हता के सामान हो। यह आयोग प्रत्येक राज्य के उच्च न्यायालय के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन एक स्वतंत्र निकाय होगा। यह आयोग को कारागृह प्रशासन पर पर्यवेक्षीय नियंत्रण रखेगा और कारागृहों के वास्तविक हालातों तथा प्रथाओं को देखने के लिए यथोचित समयाविधियों के भीतर मुआयना करेगा।

 

फूड नोट:-

1.         थ्गलिन एण्ड गिलिनि-क्रिमनालाॅजी

2.         एच.. ब्रावेस एण्ड एन.के.टीटर्स-न्यू होरीजन इन क्रिमिनालाॅजी

3.         लियोन रिडसिनोविझः ग्रोथ आॅफ क्राइम

4.         विद्याभूषण ’’प्रिजन एड मिनिस्ट्रेशन इन उत्तर प्रदेश’’ 1953

5.         जी. आर. मदान’’ इण्डियन सोशियल प्राब्लम्स’’ सीरिज-1 नई दिल्ली-1981

6.         विजय शंकर कैकरीवाॅल ’’इक्नाॅमिक एण्ड सोशियल एसपेक्ट आॅफ क्राइम इन          इण्डिया’’ एलन एण्ड अनविन लंदन 1934

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

1.         दिवाकर ’’प्रिजन एण्ड प्रिजन रिफाम्स इन ब्रिटिश इण्डिया’’ सोशल डिफ्रंेस सीरीज-20 नवम्बर -79, जनवरी 1985, नेशलन इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल डिफ्रंेस, मिनिस्टर आॅफ सोशल वेल्फेंयर, विकास नई दिल्ली

2.         कुमकुम चंदा ’’ इण्डियन जेल’’ विकास नई दिल्ली, 1983

3.         भारतीय संविधान

4.         .आई.आर. (विभिन्न संस्करण)

5.         कारागृह अधिनियम-1854

6.         पंजाब पुलिस नियमावली,1934

7.         पंजाब कारागृह नियम पुस्तक

8.         जनप्रतिनिधित्व अधिनियमख् 1951

9.         कैदियों के व्यवहार की मानक न्यूनतक नियमावली (195)

10.      मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948

11.      जे.एन. पांडे, भारतीय संविधान (1982)

12.      भारतीय संविधान:- बदसी सिंह, अरेरा,(रिप्रिंट1999) एम, एल, जे, आफिस मद्रास

13.      डी. डी बासू-भारतीय संविधान पर मामले (1950-52)

14.      इंडियन लाॅ रिव्यू, खंड-1, सं.-1

15.      यू.एन.कांग्रेस आॅन प्रिवेश आॅफ कारेक्शन सर्विस, नई दिल्ली, 1973

16.      डेªसलर डेविस: रीडिंग्स इन क्रिमिनोलाॅजी, 1964

 

 

Received on 07.12.2016       Modified on 18.12.2016

Accepted on 28.12.2016      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 196-200.